भारत में UPSC (Union Public Service Commission) को सबसे प्रतिष्ठित भर्ती संस्थानों में गिना जाता है। हर साल लाखों उम्मीदवार सिविल सेवा परीक्षा (CSE) में भाग लेते हैं, लेकिन चयनित उम्मीदवारों की संख्या बहुत सीमित होती है। 2025 में जारी रिपोर्ट के अनुसार कुल लगभग 979 वैकेंसी (CSE) और 150 IFS पद घोषित किए गए हैं।
इन आंकड़ों के पीछे एक गहरी कहानी छिपी है — राज्य-स्तर पर अवसरों का असंतुलन।
क्या कुछ राज्य लगातार अधिक चयन दर दर्ज कर रहे हैं जबकि अन्य पिछड़ रहे हैं?
क्या यह असंतुलन सिर्फ शिक्षा-सुविधाओं का परिणाम है या प्रणालीगत पक्षपात भी भूमिका निभा रहा है?
UPSC वैकेंसी और चयन की भौगोलिक असमानता
अगर पिछले एक दशक के UPSC परिणामों का विश्लेषण किया जाए तो एक स्पष्ट प्रवृत्ति दिखती है —
दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, तमिलनाडु और महाराष्ट्र से आने वाले उम्मीदवार सबसे अधिक चयनित होते हैं। इसके विपरीत, पूर्वोत्तर, हिमालयी, और जनजातीय बहुल छोटे राज्य (जैसे मिज़ोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, गोवा, सिक्किम आदि) से चयन दर बेहद कम रहती है।
इसका एक कारण है —
- इन राज्यों में UPSC तैयारी के लिए संसाधनों की कमी।
- गुणवत्तापूर्ण कोचिंग, गाइडेंस और टेस्ट सीरीज़ तक सीमित पहुँच।
- आर्थिक और डिजिटल असमानता।
- और सबसे महत्वपूर्ण, भाषाई अवरोध।
क्यों छोटे राज्य पिछड़ रहे हैं?
1. कोचिंग और मार्गदर्शन का अभाव
दिल्ली, इलाहाबाद (प्रयागराज), पटना और जयपुर जैसे शहर UPSC तैयारी के केंद्र बन चुके हैं। यहां की कोचिंग इंडस्ट्री, अनुभवी फैकल्टी और सफल उम्मीदवारों का नेटवर्क छात्रों को प्रेरित करता है। इसके उलट छोटे राज्यों में ऐसी सुविधाएं बहुत कम हैं।
2. भाषाई और सांस्कृतिक बाधाएं
कई उत्तर-पूर्वी राज्यों के उम्मीदवार अंग्रेज़ी माध्यम से परीक्षा देते हैं, लेकिन “General Studies” के प्रश्न भारत-केंद्रित सामाजिक व आर्थिक परिप्रेक्ष्य पर आधारित होते हैं। इससे उनके लिए उत्तर-लेखन में कठिनाई होती है।
3. अर्थव्यवस्था और जागरूकता की कमी
छोटे राज्यों के युवाओं में सरकारी नौकरियों को लेकर उत्साह तो होता है, लेकिन UPSC जैसी परीक्षा के लिए आवश्यक दीर्घकालिक तैयारी के साधन नहीं हैं। अनेक परिवारों में आर्थिक दबाव के कारण युवा जल्दी कमाई की दिशा में मुड़ जाते हैं।
4. डिजिटल और इंफ्रास्ट्रक्चर असमानता
ग्रामीण या पर्वतीय क्षेत्रों में इंटरनेट स्पीड, ई-लर्निंग संसाधन और डिजिटल कंटेंट की पहुंच सीमित है। इससे ऑनलाइन टेस्ट सीरीज़ या वर्चुअल गाइडेंस का लाभ नहीं मिल पाता।
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डेटा कहता है क्या?
2022 और 2023 के UPSC परिणामों के विश्लेषण से यह सामने आया कि
- 70 % से अधिक चयन मात्र 8 राज्यों से हुए।
- पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों से कुल चयन का हिस्सा 5 % से भी कम रहा।
- कुछ राज्यों (जैसे नगालैंड, मिज़ोरम, गोवा) से तो एक-दो उम्मीदवार ही फाइनल सूची में आए।
इसका मतलब यह नहीं कि इन राज्यों में प्रतिभा नहीं है — बल्कि यह बताता है कि संरचनात्मक अवसर समान नहीं हैं।
क्या UPSC प्रणाली में कोई निहित असमानता है?
UPSC की परीक्षा प्रणाली नीतिगत रूप से निष्पक्ष है। प्रश्न-पत्र और मूल्यांकन देशभर के उम्मीदवारों के लिए समान हैं।
लेकिन अप्रत्यक्ष असमानताएं मौजूद हैं — जैसे:
- शहरी छात्रों को बेहतर संसाधन मिलना,
- अंग्रेज़ी माध्यम की तैयारी में सुविधा,
- और डिजिटल अध्ययन सामग्री की अधिक उपलब्धता।
इससे छोटे राज्यों के प्रतिभाशाली उम्मीदवार भी प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं।
क्या समाधान संभव हैं?
1. राज्य-स्तरीय UPSC सहायता केंद्र
हर राज्य सरकार को चाहिए कि वह UPSC / IAS अकादमी या मेंटरशिप हब स्थापित करे, ताकि स्थानीय छात्रों को दिल्ली या अन्य शहरों पर निर्भर न रहना पड़े।
2. ऑनलाइन मार्गदर्शन और डिजिटल पहुंच बढ़ाना
केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर UPSC सिलेबस आधारित डिजिटल कोर्स और टेली-मेंटोरिंग प्रोग्राम चला सकती हैं।
3. भाषाई विविधता को बढ़ावा
UPSC ने कई भारतीय भाषाओं में परीक्षा की अनुमति दी है, लेकिन क्षेत्रीय भाषा के उम्मीदवारों के लिए उत्तर-लेखन प्रशिक्षण की कमी है। इसे बढ़ावा देने से छोटे राज्यों के उम्मीदवार लाभान्वित होंगे।
4. सफल उम्मीदवारों को रोल-मॉडल बनाना
पूर्वोत्तर या पहाड़ी क्षेत्रों से सफल सिविल सेवकों को रोल-मॉडल के रूप में सामने लाकर युवाओं में प्रेरणा जगाई जा सकती है।
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क्या यह असंतुलन अवसर भी बन सकता है?
दिलचस्प बात यह है कि कुछ छोटे राज्यों ने अब नए अवसरों की दिशा में कदम बढ़ाया है।
- मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में राज्य सिविल सेवा (PSC) परीक्षाओं में अधिक वैकेंसी और रिज़र्वेशन लाभ मिल रहे हैं।
- ये राज्य अपने “home cadre preference” से भी फायदा उठा सकते हैं, यदि वे केंद्रीय सेवा में चयनित होते हैं।
- साथ ही, छोटे राज्यों में अब UPSC / PSC कोचिंग के लिए स्टार्टअप-मॉडल पर निजी संस्थान भी खुलने लगे हैं।
इसलिए यह असंतुलन समस्या भी है और अवसर भी —
अगर नीति-निर्माता इस पर ध्यान दें तो भारत के हर कोने से “सिविल सर्वेंट्स” निकल सकते हैं।
निष्कर्ष
UPSC की परीक्षा भारतीय युवाओं के लिए सबसे बड़ा समान अवसर का प्रतीक मानी जाती है, लेकिन भौगोलिक असमानता इस “समान अवसर” की भावना को चुनौती देती है।
जरूरत है